कभी काग्रेस के अभ्ेद्य किला रहे पलामू लोक सभा चुनाव में कॉग्रेस का सिम्बल दर्षन तक को मुहंताज है मतदाता
गढ़वा - पलामू संसदीय क्षेत्र की राजनीति में पहले चुनाव 1951 से ही प्रभावी रही काग्रेस का इस लोक सभा से चुनाव जीतने का बड़ा रिकार्ड है । रिकार्ड ऐसा कि इसे देखकर कॉग्रेस की वर्तमान दुर्दषा का एहसास करना भी नामुमकिन सा लगता है। झारखंड के चौहहवें लोकसभा क्षे़ के रूप में यहां भी आजादी के बाद पहला मर्तबा 1951 जब चुनाव हुआ तो गजेन्द्र पसद सिन्हा को पहला सांसद बनने का गौरव हासिल हुआ। वे दो मतर्बा लागातर चुनाव जीत कर सांसद बने । बीच में 1962 के चुनाव में इस सीट को अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित किए जाने के बाद पहला सांसद सषांक मंजरी बनी जो स्वतंत्र पार्टी ये चूनाव जीतकर सांसद पहुंची । मगर 1967 में कमलाकुमारी जबसे सांसद बनी उन्होंने अंगद की तरह काग्रेस पार्टी को इस लोक सभा क्षेत्र ऐसा पांव जमाया कि 1977मे आपातकाल के कांग्रेस के सबसे बुरे दिन में हुए लोक सभा चुनाव में जनता पार्टी के रामदेनी राम से चूनाव भले हार गयी मगर पुनः 1980 मे काग्रेस पार्टी से चूनाव जीतकर चार बार पलामू लोक सभा के नेतृत्व करने का जो अठारह साल का रिकार्ड उन्होंने बनाया ह ैअब तक किसी दल के किसी व्यक्ति ने नही तोड़ पाया है। मगर 1989 में जनता दल के प्रत्याषी जोरावर राम से चुनाव हारने के बाद कॉग्रेस इस सीट पर ऐसा बैकफुट पर गयी कि दुबारे चुनाव जीतने की बात तो दुर धीरे - धरे ऐसा बाहर होती गयी कि पिछले कइ चुनाव से पलामू के मतदाता लोकसभा में कॉग्रेस के हांथ छाप के सिम्बल नही देख पाए हैं


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