गढ़वा:-श्री राम लला मंदिर सोनपुरवा गढ़वा में श्री राम नवमी महोत्सव के तहत आयोजित श्री रामचरितमानस परायण यज्ञ सह प्रवचन कार्यक्रम के दूसरे दिन वृंदावन से पधारे विद्वान आचार्य संजय कृष्ण शास्त्री ने श्रीमद् भागवत कथा का वाचन करते हुए भक्तजनों को सन्मार्ग का राह दिखाया। उन्होंने कहा कि प्रेतयोनि में पडे लोगों के लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करने की क्षमता भागवत कथा में है। उन्होंने इस प्रसंग को उदाहरण के रूप में समझाते हुए कहा कि एक बड़े धर्मज्ञ आत्म देव जी थे। उनके एकमात्र संतान धुंधकारी थे। संजय कृष्ण शास्त्री ने कहा कि जिनके एक पुत्र होते हैं उनके बिगड़ने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा ही धुंधकारी के साथ भी हुआ। धुंधकारी की आदत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी एवं आत्म देव के स्वर्ग के समान घर को नर्क बना दिया। घर के कोने-कोने में मांस एवम शराब दिखने लगे।यह देख कर आत्मदेव काफी दुखी रहते थे। उन्हें लगा कि इस घर का त्याग कर देना चाहिए। इसी उलझन में थे कि उनके पास गोकरण जी पहुंचे। गोकरण जी गाय के पुत्र को कहते हैं। गोकरण जी आत्म देव जी को पितामह कह कर पुकारे एवम कहा कि वह उनके पुत्र ही समझें। उन्होंने आत्म देव जी की चिंता के बारे में पूछा एवं उन्हें उपदेशित करते हुए कहा कि शरीर के प्रति ममता का परित्याग कर दे। मैं शरीर हूं। मैं अमीर हूं। इसे छोड़ दीजिए। पुत्र के प्रति मोह के कारण आपके मन में तरह-तरह की भ्रांतियां फैल रही हैं। शरीर की गति तीन होती है। उसे जला दे तो राख हो जाएगा। फेक दे तो जानवर खा जाएंगे एवं जमीन में गाड़ दे तो मिट्टी हो जाएगा। यह शरीर पृथ्वी, जल, वायु आग और आकाश के मिलन से बना है। इसलिए इसके प्रति मोह ठीक नहीं है। आदमी अकेला आया है और अकेला ही जाएगा, परंतु आत्म देव जी का मानें नहीं। वह अपना घर छोड़ जंगल में चले गए। यह जानकारी जब धुंधकारी को मिली तो बहुत खुश हुआ। बोला कि अब मैं ही घर का राजा हो गया। उसके बाद वह अपनी माता के साथ भी मारपीट करने लगा। जेवर आदि मांगने लगा। ताकि शराब-मांस की व्यवस्था करने में उसे आसानी हो। पुत्र के इस रूप को देखकर मां काफी दुखी हुई। उसने एक दिन आधी रात्रि में कुएं में कूद कर अपनी जान दे दी। इससे धुंधकारी और खुश और आजाद हो गया।अब उसने 5-5 वेश्याओं को अपने घर में रखना शुरू किया। वैश्याएं भी उससे काफी पैसा कमाए। धुंधकारी जिस राज्य में रहता था उस राजा की शिकायत करने लगा था। इससे वैश्याएं डर गई।उन्हें लगा कि धुंधकारी को सहयोग करने में उन्हें दंड का भागी बनना पड़ेगा। इस कारण वे सभी मिलकर धुंधकारी को मार डाला एवं उसी के आंगन में गाड़कर वहां से निकल गए। गौकरण जी बहुत दिनों बाद पुनः उसघर में पहुंचे। रात्रि हुई तो सोचा थोड़ा विश्राम कर ले। इस दौरान उन्हें बहुत तरह की आवाजें सुनाई दी। उन्हें लगा ऐसा क्यों हो रहा है। उन्होंने अपने कमंडल से जल निकाल कर आंगन में छिड़काव किया तो पता चला कि धुंधकारी की प्रेत आत्मा इस घर में रची बसी है। धुंधकारी ने गोकरण जी से प्रेत योनि से आजादी दिलाने का निवेदन किया। गोकरण ने इसका उपाय ढूंढना शुरू किया। इसी क्रम में उन्होंने उसी का मंडल के जल से सूर्य के रथ को रोक लिया। भगवान सूर्य ने उन्हें ज्ञान देते हुए कहा कि यदि आप धुंधकारी को प्रेत योनि से बाहर निकालना चाहते हैं इसे श्रीमद् भागवत कथा सुनाना पड़ेगा। तभी ऐसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल सकती है। गोकरण जी ने ऐसा ही किया एवं उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई। गोकरण जी जब श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन कर रहे थे तो बहुत सारे लोग इस कथा का श्रवण कर रहे थे। कथा सुनने के बाद धुंधकारी प्रेत योनि से आजाद हो गया। उसके बाद स्वर्ग लोक से उसके लिए विमान भेजा गया। शेष लोगों ने गोकरण जी से सवाल किया श्रीमद् भागवत कथा हम लोग भी सुने। हमारे लिए विमान नहीं आया। केवल धुंधकारी के लिए ही क्यों। गोकरण जी ने बड़ा शालीन भाव से कहा कि श्रीमद् भागवत कथा सुनने से कुछ नहीं होता उसे सुनकर चिंतन करना पड़ता है। धुंधकारी ने दिन में कथा का श्रवण किया और रात में रात भर उसका चिंतन किया। यही कारण है कि उसने स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर लिया।इसलिए श्रीमद् भागवत कथा को एकाग्रचित मन से सुनें एवं उसका चिंतन करें।तभी हमें भगवान की प्राप्ति हो सकती है। मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। स्वर्ग कोई सुविधा संपन्न व्यवस्था का नाम नहीं है, बल्कि वह साक्षात श्री भगवान का चरण है सानिध्य है।इसे प्राप्त करने के लिए श्रीमद् भागवत कथा को अपने हृदय में, अपने कार्यों में, अपने व्यवहारों में, अपनी बातों में उतारने की जरूरत है और यह कथा तब तक चलती रहेगी जब तक पूरे संसार का एक- एक मानव इस राह पर नहीं चल पड़ता है.। इस कार्यक्रम में आचार्य संजय कृष्ण शास्त्री के साथ सहयोगी के रुप में सुनील शास्त्री, रविंद्र नाथ तिवारी, धनजी सहित कई लोग शामिल है। इस मौके पर मंदिर कमेटी के सचिव धनंजय सिंह, संरक्षक महेंद्र प्रसाद, बैजनाथ सिंह, उपाध्यक्ष सुदर्शन सिंह, अनिल शर्मा, कोषाध्यक्ष धनंजय गोंड, सह सचिव सत्यनारायण दुबे सहित कई भक्तगण एवं माताएं उपस्थित थी।
प्रेत योनि से स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करता है भागवत कथा-संजय कृष्ण
प्रकाशित तिथि -
March 20, 2018
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रिपोर्टर -Unknown
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